दो हफ्ते पहले महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के एक ट्वीट ने बहुत सुर्खियां बटोरीं थीं। ट्वीट में चव्हाण ने लिखा था, “वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक भारत के धार्मिक ट्रस्टों के पास 1 ट्रिलियन डॉलर (76 लाख करोड़) का सोना है, भारत सरकार को देश के इन तमाम धार्मिक ट्रस्टों के पास मौजूद सोने का तुरंत इस्तेमाल करना चाहिए। आपातकाल जैसी इस स्थिति में सरकार गोल्ड बॉन्ड्स के जरिए सरकार कम ब्याज दरों पर यह सोना उधार ले सकती है।”

चव्हाण के इस ट्वीट के बाद भाजपा नेता उन पर बरस पड़े थे। भाजपा से राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा भी इनमें से एक थे। इन्होंने इस ट्वीट के जवाब में लिखा था, “क्या कांग्रेस अपने नेता पृथ्वीराज चव्हाण की राय से इत्तफाक रखती है कि मंदिरों का सोना ले लेना चाहिए ? क्या पृथ्वीराज चौहान जी अकेले कैथेड्रल चर्च की जमीन जिसकी अनुमानित कीमत 7000 करोड़ है, वक्फ जिसकी अनुमानित सम्पत्ति 60 लाख करोड़ है उसका भी इस्तेमाल करने की भी बात करेंगे?”

ये दो हफ्ते पहले की बात है लेकिन सोशल मीडिया पर यह बहस अभी भी जारी है। क्या देश के मंदिरों का सोना इस आपात स्थिति में उपयोग किया जाना चाहिए? क्या वक्फ बोर्ड के पास भी सोना है? क्या उसकी संपत्ति भी कोरोना से आहत हुई अर्थव्यवस्था को सींचने में उपयोग की जा सकती है? इन सवालों के जवाब सोशल मीडिया पर लोग अपने-अपने अंदाज में दे रहे हैं।

हमने भी इस पर कुछ रिसर्च की और पाया कि वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के एक अनुमान के मुताबिक भारत के मंदिरों में 2 हजार टन सोना है। अलग-अलग अनुमानों में इसे 3 हजार से 4 हजार टन के बीच भी बताया गया है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की ही मानें तो भारत के मंदिरों के पास जो सोना है, वह भारत के रिजर्व बैंक के पास मौजूद सोने का तीन गुना है। जून 2019 की वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक के पास 618 टन सोना मौजूद था।

केन्द्र सरकार को नहीं पता कि मंदिरों के ट्रस्टों के पास कितना सोना है?

22 दिसंबर 2015 को राज्यसभा में सांसद रंजिब बिस्वाल ने जब भारत के मंदिरों में सोने की अनुमानित मात्रा का ब्यौरा मांगा था, तो इस पर वित्त मंत्रालय का कहना था कि उनके पास देश के मंदिरों में सोने के भंडार के बारे में कोई आंकड़ा नहीं है। इसके साथ ही रंजिब बिस्वाल ने यह भी पूछा था कि क्या सरकार ने गोल्ड मोनेटाइजेशन स्किम के माध्यम से मंदिरों के गोल्ड रिजर्व को वित्तीय प्रणाली में शामिल करने के लिए इनके ट्रस्टों से बातचीत शुरू की है? इस पर भी वित्त मंत्रालय का जवाब ना में ही मिला था।

गोल्ड मोनेटाइजेशन स्किम से मंदिरों का सोना बाजार में आने की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा बहुत कम हुआ
साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गोल्ड मोनेटाइजेशन स्किम लॉन्च कर घरों और मंदिरों में पड़े इस सोने को बाहर निकालने की एक कोशिश की थी। इसी साल आकाशवाणी पर प्रसारित ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा था, “सोने को ‘डेड मनी’ के रूप में रखना यह आज के युग में शोभा नहीं देता है। सोना डेड मनी से एक जीवंत ताकत के रूप में परिवर्तित हो सकता है, अब घर में गोल्ड मत रखिए। उसे बैंक को दीजिए, ब्याज लीजिए और खुद को और देश को आर्थिक रूप से मजबूत कीजिए।”

मोदी की इस पहल पर कई मंदिर आगे भी आए थे। उन्होंने बैंकों में गोल्ड डिपोजिट कराया। लेकिन ज्यादातर मंदिरों के ट्रस्टों ने इस पर रूचि नहीं ली। लेकिन सरकार की इस योजना से यह कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी भी पृथ्वीराज चव्हाण की तरह ही बेकार पड़े सोने को अर्थव्यवस्था में लाकर इसे तेजी प्रदान करना चाहते थे।

यूपीए सरकार के आखिरी साल में रिजर्व बैंक ने मंदिरों से गोल्ड स्टॉक का ब्यौरा मांगा था

सितंबर 2013 में भारतीय रिजर्व बैंक ने देशभर के मंदिर ट्रस्टों से उनके पास जमा सोने का ब्यौरा मांगा था। उस समय भी हिंदू संगठनों ने और मंदिरों के ट्रस्टों ने इस पर आपत्ति जताई थी। इस बार भी जब पृथ्वीराज चव्हाण के ट्वीट पर कंट्रोवर्सी बनी तो कई पुजारियों को यह कहते सुना गया कि भक्त सोने को भगवान को चढ़ाते हैं, यह इसलिए नहीं होता कि ट्रस्ट इसे सरकार को दान दे दें या उधार दें। लोगों की भावनाएं इससे जुड़ी होती हैं, ट्रस्ट भक्तों के विश्वास को नहीं तोड़ सकते।

कमोडिटी एक्सपर्ट की राय- मंदिरों से सोना लेकर सरकार सिर्फ अगले कुछ सालों तक गोल्ड इंपोर्ट कम कर सकती है
कमोडिटी एक्सपर्ट अजय केडिया बताते हैं कि फिलहाल ऐसी नौबत नहीं आई है कि सरकार को मंदिरों का सोना लेने की जरूरत पड़े। इस सोने को लेकर सरकार अपना गोल्ड रिजर्व बढ़ा सकती है लेकिन वर्तमान में केन्द्रीय बैंक के पास पर्याप्त गोल्ड रिजर्व है, तो इसकी भी जरूरत नहीं। 1990 में सरकार को अपना सोना गिरवी रखने की जरुरत पड़ी थी, वैसे हालात अभी बिल्कुल नहीं है।

"सरकार बस इस सोने को गोल्ड मोनेटाइजेशन योजना के तहत उपयोग कर सकती है। इसके तहत मंदिर अगर बैंकों में सोना डिपोजिट करते हैं तो इसे पिघलाकर ज्वैलर्स को लोन पर दिया जाता है ताकि देश में उपलब्ध सोने से ही लोगों की मांग की पूर्ति की जा सके और सोने के आयात से होने वाला वित्तीय घाटा कम किया जा सके। भारत पिछले तीन सालों से औसतन 750 टन सोना आयात कर रहा है। अगर मंदिरों का सोना मिलता है तो अगले 3-4 सालों तक बाहर से सोना आयात करने की जरुरत नहीं होगी। यानी देश का पैसा देश में रहेगा। मंदिरों का सोना उधार लेकर हम बस यही कर सकते हैं।"

तिरुपति बालाजी में हर सप्ताह औसतन 10 किलो सोना चढ़ता है। एक अनुमान के मुताबिक यहां 200 टन सोना है।

देश में मंदिरों के पास तो सोना है, लेकिन क्या वक्फ बार्ड के पास भी सोने का कोई स्टॉक है?

इस सवाल पर हमें कुछ खास जानकारी नहीं मिली। लेकिन देशभर में वक्फ की संपत्ति को लेकर एक डाटा जरूर मिला। राज्यसभा में 9 अगस्त 2016 को सासंद हुसैन दलवाई के एक लिखित सवाल के जवाब में अल्पसंख्यक मंत्रालय ने बताया था कि सच्चर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में 6 लाख एकड़ वक्फ भूमि है और इसकी कीमत 1.2 लाख करोड़ है।

हालांकि इसमें अतिक्रमण की गई प्रापर्टी का ब्यौरा शामिल नहीं था। मंत्रालय का कहना था कि अतिक्रमण की गई प्रापर्टी को वह वक्फ की संपत्ति नहीं मानता इसलिए इसका ब्यौरा इसमें शामिल नहीं है। वहीं पिछले साल नवंबर में मुख्तार अब्बास नकवी ने बताया था कि देश भर में वक्फ की 16,937 प्रापर्टी अतिक्रमण कर के बनाई गई है।



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साल 2011 में केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर में 22 अरब डॉलर का खजाना मिला था। इसमें सोने-चांदी और हीरे के प्राचीन और अनोखे आभूषण और मूर्तियां मिलीं थीं। यह सब इसके 5 तहखानों में से मिले थे। छठा तहखाना जो कि सबसे बड़ा है, उसे अब तक नहीं खोला जा सका है। सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर सुनवाई हो रही है।


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