भले लाॅकडाउन खुलने की स्थितियां बन रही हैं औरबच्चे कई गतिविधियाें की प्लानिंग कर रहे हैं मगर परिजन को तो उन्हें समझाना ही पड़ रहा है कि अब वे बहुत ज्यादा शौक पूरे नहीं कर पाएंगे। परिजन किराए और भोजन के लिए पर्याप्त पैसे होने की बात कहकर उम्मीद बंधा सकते हैं, लेकिन बच्चों केआंख-कान तेज होते हैं। ऐसी स्थिति में जानिए कि अगर नौकरी चली जाए तो बच्चों के सवालों और नजरों का सामना कैसे करेंः

अपनी चिंता पर गाैर करें
ग्राहक केंद्रित अर्थव्यवस्था औरसेल्फ ब्रांडिंग के दाैर में अपने बजट काे बढ़ाना और‘क्या जरूरी है’ काे ‘हम क्या चाहते हैं’ से अलग करना मुश्किल है। तय करें कि इस खराब माहाैल में भी आप सतर्क परिजन बने रहेंगे। बच्चाें काे आश्वस्त करें किबदतर स्थिति में भी आपकेपास इतने पैसे रहेंगे कि बिल चुका सकते हैं और भोजन खरीद सकते हैं।

यदि कुछ नया करने जा रहे हैं, या बेराेजगारी लाभ प्राप्त कर रहे हैं ताे वह भी बताएं। इससे उन्हें आपके संसाधनाें और याेजनाओं के बारे में जानकारी मिलेगी। उनके सवाल गाैर से सुनें।
कड़वा सच बताएं कि नहीं
बच्चाें से बात करते समय यह तय करें कि उन्हें कितना बताना है। यह इस पर निर्भर करता है कि बच्चे की उम्र क्या है, नकारात्मक खबर सुनने की क्षमता कैसी है। बच्चाें काे नए आर्थिक परिदृश्य में सामंजस्य बैठाने के बारे में बताकर भी सच से अवगत करा सकते हैं। छाेटे बच्चे यह साेच सकते हैं कि बड़ाें के साथ बुरा हाे गया है ताे हमारे साथ भी ऐसा होगा। बुरे सपने आसकते हैं।

किशाेर यह जानने के लिए उत्सुक हाेंगे कि हम अब भी डिनर पर जा सकेंगे?, मैं पहले वाले स्कूल ही जाऊंगा?, हम बेघर हाे जाएंगे? उन्हें बताएं कि क्या वैसा ही रहेगा औरक्या बदल सकता है। हर बदलाव से अवगत कराएं।
आगे की साेचें
बच्चाें काे समझाएं कि अर्थव्यवस्था दाैड़ते ही, परिस्थिति भी बदलेगी। नई नाैकरी मिल सकती है। आपकी परिस्थितियां बदल सकती हैं। नए दाैर में पूरे परिवार काे छाेटी टीम मानकर चलें।




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