कोरोनावायरस का पहला मामला दिसंबर 2019 में चीन में आया था। देखते ही देखते यह दुनियाभर में फैल गया।वायरस चीन के वुहान में पैदा हुआ। यहां से हॉन्गकॉन्ग महज 919 किमी की दूरी पर स्थित है।इसके बावजूद हॉन्गकॉन्ग में एक बार भी पूरी तरह से लॉकडाउन नहीं किया गया। यहां जरूरी जगहों पर ही पाबंदियां लगाई गईं।

करीब 74 लाख की आबादी वाले हॉन्गकॉन्ग से पाबंदियां अब पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं।हॉन्गकॉन्ग के मॉडल की दुनियाभर में चर्चा भी है। अप्रैल के मध्य में जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, नॉन फार्मास्युटिकल इंटरवेंशन जैसे, सीमा प्रतिबंध, क्वारैंटाइन, आइसोलेशन, डिस्टेंसिंग और लोगों के व्यवहार में बदलाव से हॉन्गकॉन्ग में कोविड-19 के फैलाव को रोकने में मदद मिली।

जयपुर के राहुल गांधी पिछले पिछले करीब 7 सालों से हॉन्गकॉन्ग में हैं। वे केजीके ग्रुप में जॉब करते हैं। अभी हॉन्गकॉन्ग में ही हैं। वेकहते हैं कि2002 में सीवियर एक्यूट रेसपिरेटरी सिंड्रोम (सार्स) ने चीन पर अटैक किया था।तब ही लोग वायरस से बचने के लिए काफी तरीके सीख चुके थे, जो अभी काम आए।राहुल यह भी कहते हैं, यहां सरकार को लोगों को ज्यादा समझाना नहीं पड़ा।बल्कि लोग खुद ही अवेयर हो गए। चीन में जैसे ही वायरस फैलने की बात चली, हॉन्गकॉन्ग ने अपनी बॉर्डर सील कर दी। चीन से आना-जाना पूरी तरह से रोक दिया गया।

हॉन्गकॉन्ग की एक जिम में सैनिटाइजेशन करती महिला सफाईकर्मी।

राहुल के मुताबिक, ‘‘भारत में अफवाहें भी बहुत फैलती हैं, जिससे लोग कन्फ्यूज हो जाते हैं, लेकिन यहां सिर्फ सरकार से ही जानकारियां सामने आती हैं,इसलिए लोगों में किसी भी तरह का कन्फ्यूजन नहीं होता।’’वायरस को फैलने से रोका कैसे गया? इस पर राहुल कहते हैं लोगों ने खुद ही एकसाथजुटना बंद कर दिया है। सैनिटाइजर हर कोई अपने साथ रखता है।
सोशल डिस्टेंसिंग को सख्ती से फॉलो किया गया।

सतना के हेमंत त्रिपाठी भी अभी हॉन्गकॉन्ग में ही जॉब कर रहे हैं।वे टेलस्ट्रा कंपनी में सॉल्यूशन आर्किटेक्ट हैं। हॉन्गकॉन्ग ने कोरोना को कैसे रोक लिया? इस पर हेमंत बोले, यहां अधिकांश लोग मास्क पहनते हैं। बिनामास्क के कहीं कोई नजर नहीं आता। खासतौर से ज्यादा भीड़भाड़ वाले इलाकों में।पहले दिन से ही यह नियम सख्ती के साथ फॉलो हुआ।लोग मेट्रो में भी बिंदास सफर कर रहे हैं। सिर्फ मास्क पहनते हैं और आते-जाते वक्त हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करते हैं।लिफ्ट या किसी भी ऑब्जेक्ट को टच करते हैं तो टिश्यू पेपर का यूज करते हैं। उसे यहां-वहां नहीं फेंका जाता, बल्कि ढक्कन वाले डस्टबिन में ही फेंका जाता है।ऐप से भी लोगों को बहुत मदद मिली।

हेमंत कहते हैं, यहां पूरी तरह से लॉकडाउन एक बार भी नहीं हुआ।


हेमंत के मुताबिक,जैसेभारत में आरोग्य ऐप लॉन्च किया गया,वैसाहॉन्गकॉन्ग में काफी पहले से ही था।हर किसी के फोन में ऐप डाउनलोड है। इससे पता चल जाता है कि कहां खतरा है और कहां नहीं। जहां खतरा होता है, वहां लोग खुद ही नहीं जाते।

हॉन्गकॉन्ग में पब्लिक प्लेसेस पर एक दिन में तीन से चार बार सैनिटाइजेशन होता है।

हेमंत बताते हैं कि हॉन्गकॉन्ग सरकार ने टेक्नोलॉजी का भी बखूबी इस्तेमाल किया।क्वारैंटाइन किए गए लोगों को रिस्टबैंड पहनाया जाता है।इसमें जीपीएस लगा होता है। जो उनकी लोकेशन ट्रैस करता है।इससे कोई भी आइसोलेशन के नियम को तोड़ नहीं सकता। यदि कोई रिस्टबैंड को बंद करता है, तो तुरंत सरकार को पता चल जाता है।यदि कोई रिस्टबैंड पहना व्यक्ति बाहर घूम रहा दिख रहा होता है तो दूसरे लोग भी उसका वीडियो बनाकर एडमिनिस्ट्रेशन को भेज देते हैं। आइसोलेशन के रूल यहांसख्ती से फॉलो किए जाते हैं।

हेमंत कहते हैं कि यहां एयरपोर्ट्स, पोर्ट्स को तुरंत बंद कर दिया गया था। स्कूल्स, क्लब्स, जिम, सिनेमा और पार्लर को भी बंद किया गया, लेकिन पूरी तरह से लॉकडाउन एक बार भी नहीं हुआ।रेस्टोरेंट्स और मॉल्समें स्क्रीनिंग के बाद ही एंट्री थी।

खतरे का स्तर पता लगाने के लिए यहां अधिकांश लोग सरकार के ऐप का इस्तेमाल करते हैं।

वेपोराइज्ड हाइड्रोजन परॉक्साइड (VHP) रोबोट्स से लेकर इंटेलिजेंट स्टरलाइजेशन रोबोट तक का एयरपोर्ट्स और रेलवे स्टेशन पर इस्तेमाल किया गया।इसमें यूवी लाइट टेक्नोलॉजी, 360 डिग्री स्प्रे नोजल्स और एयर फिल्टर्स के लिए जर्म्स और वायरस खत्म किए गए।इसके अलावा फुल बॉडी डिसइंफेक्शन चैनल फेसिलिटी, ऑटोनोमस क्लीनिंग रोबोट्स का भी इस्तेमाल किया गया।
हॉन्गकॉन्ग का मॉडल कोई रहस्यमयी या यूनिक नहीं है। बल्कि यह एक कॉम्बिनेशन है। इसमें सीमा प्रतिबंध, क्वारेंटाइन, आइसोलेशन और सोशल डिस्टेंसिंग शामिल हैं।



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Here the lockdown is not under control yet, due to wristbands, isolation rules cannot be broken by anyone.


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