सवाई मानसिंह अस्पताल (एसएमएस) राजस्थान का सबसे बड़ा अस्पताल है। वही अस्पताल जिसने इटली की दंपती सहित सैंकड़ों कोरोना संक्रमित मरीजों का पिछले तीन माह में इलाज किया।पिछले दिनों इस अस्पताल को कोविड फ्री कर यहां भर्ती सभी मरीजों को प्रताप नगर स्थित आरयूएचएस में शिफ्ट कर दिया गया। स्वास्थ्य विभाग ने यह भी निर्देश जारी कियाकि एसएमएस अस्पताल के डॉक्टर्स आरयूएचएस में भर्ती मरीजों का इलाजकरने जाएंगे।

हम मरीजों के इलाज की व्यवस्था का हाल जानने आरयूएचएस पहुंचे। करीब चार से पांच घंटे अस्पताल के बाहर रुके। वहां आने-जाने वाले मरीजों के परिजन और छुट्‌टी लेकर घर लौट रहे मरीजों से बातचीत की।

अपनी बच्ची को चिप्स खिलाते हुए गुलाम मोहम्मद।

इसी बीच अस्पताल के बाहर ऑटो रिक्शा के इंतजार में सड़क किनारे एक व्यक्ति अपनी बेटी के साथ बैठा नजर आया। पांच साल की इस बच्ची के हाथ में प्लास्टर बंधा हुआ था और वो अपने पिता के साथ खेल रही थी।

कुछ देर बाद अस्पताल के गेट से एक महिला भी निकलकर बाहर आई और वहीं बैठ गई। तब बच्ची उस महिला की गोद में आकर बैठ गई। इस सवाल पर कि क्या आपका भी कोई अस्पताल में भर्ती है?तो उस बच्ची के पिता बोले हमारी बेटी को कोरोना हो गया था।

उस व्यक्ति ने अपना नाम गुलाम मोहम्मद बताया। उन्होंने कहा-मेरी बेटी को कोरोना हो गया था और आज ठीक होने के बाद उसे छुट्‌टी मिली है। उसके हाथ के प्लास्टर की ओर इशारा किया तो उन्होंने बिना रुके पिछले सात दिनों की आपबीती सुना डाली।

उन्होंने कहा किबेटी की कोहनी में चोट लगी थी, फ्रैक्चर हुआ था तो इसका इलाज करवाने अपनी पत्नी के साथट्रॉमा सेंटर, एसएमएस अस्पताल पहुंचे। वहां डॉक्टरों ने प्लास्टर चढ़ा दिया। इस बीच मेरी बेटी को वार्ड नंबर 205 में शाम 4 बजे से रात 2 बजे तक आइसोलेशन वार्ड में भर्ती रखा। डॉक्टर्स ने बताया किपहले बच्ची का कोरोना टेस्ट होगा और रिपोर्ट आने के बाद ही फ्रैक्चर का इलाज शुरूहोगा।

उसी दिन देर रात 2 बजे बेटी का सैंपल लिया गया। अगले दिन 1 जून को सुबह तक रिपोर्ट नहीं आई थी। इस दौरान बेटी के हाथ का दर्द बढ़ता जा रहा था। बच्ची को दर्द से बिलखते देखकर हम काफी परेशान हो गए थे।

बेटी के हाथ का दर्द बढ़ता जा रहा था। बच्ची को दर्द से बिलखते देखकर हम काफी परेशान हो गए थे।

मैंने आग्रह किया तो डॉक्टर ने मुझे हड्‌डी वार्ड में बुलाया। वहां बच्ची का 2 जून को ऑपरेशन करना तय हुआ। मैं बच्ची को वार्ड में ले जा रहा था। तभी मुझे फोन आया कि आपकी बच्ची कोरोना पॉजिटिव है। मैंने ये बात वार्ड में मौजूद मेडिकल स्टाफ को बताई।

गुलाम मोहम्मद कहते हैं, इसके बाद उन्हें व पत्नी को बेटी के साथ दोपहर को एंबुलेंस से आरयूएचएस भेज दिया गया। हमबच्ची को अकेला नहीं छोड़ सकते थे। इसलिए हमें पहली मंजिल पर बेटी के साथ रुकना पड़ा।

तब मैंने स्टाफ से कहा कि मेरी और पत्नी कीभी कोरोना की जांच कर लो, क्योंकि हम पिछले कई घंटों से साथ है। लेकिन हमारा टेस्ट नहीं किया गया। आखिरकार, 5 जून को बच्ची का एक और टेस्ट किया गया। जिसकी रिपोर्ट 6 जून को निगेटिव आई। तब मैंने मेडिकल स्टाफ से कहा कि हमें छुट्‌टी दे दो, ताकि बच्ची का ऑपरेशन करवा सकें लेकिन तब स्टाफ ने कहा कि नहीं, अब आप दोनों पति-पत्नी का कोरोना जांच के लिए सैंपल लिया जाएगा।

गुलाम मोहम्मद और उनकी पत्नी शबनम ने कहा किजब हम पांच दिन से बच्ची के साथ थे। हम खुद सैंपल टेस्ट के लिए कह रहे थे। तब हमारा सैंपल नहीं लिया गया और जब बच्ची की रिपोर्ट निगेटिव आई तो सैंपल लेने की बात करने लगे।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद 9 जून को बच्ची के हाथ के ऑपरेशन के लिए माता- पिता ने डॉक्टरों से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि 15 दिन का क्वारैंटाइन पीरियड पूरा होने पर ही इलाज करेंगे।

गुलाम मोहम्मद के मुताबिक, ड्यूटी पर मौजूद कुछ डॉक्टर और नर्स अच्छी तरह सेमरीजों का ध्यान रखते थे। वे फोन पर और वार्ड तक आकर बच्ची के बारे में पूछते रहते थे। मेडिकल स्टाफ वार्ड से करीब 20-30 फीट की दूरी पर जमीन पर खाना व नाश्ता रख जाते थे। इसके बाद हम लेकर खा लेते थे।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद 9 जून को बच्ची के हाथ केऑपरेशन के लिए माता-पिता ने डॉक्टरों से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि 15 दिन का क्वारैंटाइन पीरियड पूरा होने पर ही इलाज करेंगे। यही वजह है कि पिछले 10 दिनों से यह दंपती अपनी मासूम बच्ची का टूटा हाथ लेकर इलाज के लिए घूम रहे हैं।

गुलाम की पत्नी शबनम कहती हैं कि 8 जून को जांच रिपोर्ट आ गई, लेकिन स्टाफ ने मुझे अटका दिया। मेरे पति और बेटी को छुट्टी देते हुए कहा कि तुम ढाई हजार रुपए दे दो। तुम्हारी पत्नी की भी जल्दी जांच निकलवा देंगे।

तब गुलाम मोहम्मद ने कहा कि आप इनकी भी जांच रिपोर्ट निकलवा दो। मेरी पत्नी गर्भवती है। रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई तो दिक्कत हो जाएगी, आप इन्हें छुट्‌टी दे दो। तब एक वार्ड बॉय आया और उसने बोला कि ढाई हजार रुपए लगेंगे।

शबनम बोलीं, 100-200 की बात होती तो हम दे देते लेकिन ढाई हजार रुपए कहां से लाएं। इतने रुपए होते तो प्राइवेट अस्पताल में इलाज करवाते। हम तो खुद किराए से रहते हैं। पहले ही तीन महीने का 10 हजार रुपए का किराया चढ़ गया है।

वह व्यक्ति जिद पर अड़ा रहा। कहने लगा ढाई हजार रुपए ही लगेंगे। तुम अपनी बच्ची को लेकर जाओ। तब मजबूरी में मैंने अपने पति से कहा कि तुम तो बाहर निकलकर बच्ची का इलाज करवाओ। मैं आज नहीं तो कल परसों रिपोर्ट आने पर आ जाऊंगी। इस घटना के 20 मिनट बाद स्टाफ ने गुलाम मोहम्मद को कहा कि तुम आधा घंटा रुको और अपनी पत्नी को ले जाना। उसकी रिपोर्ट निगेटिव आई है।

शबनम कहतीं हैं, जरूरत पड़ने पर घर से सामान मंगवाना पड़ता था और कोई सामान लेकर अस्पताल आता, तो उसे वार्ड तक पहुंचाने के लिए वहां ड्यूटी कर रहा वार्ड बॉय 50 रुपए मांगता था।

शबनम कहतीं हैं, ‘5 जून को उनकी बच्ची की दूसरी रिपोर्ट निगेटिव आ गई। इसके बाद स्टाफ ने पूछा कि शबनम नाम की पेशेंट कौन है। मैंने कहा कि सर, मैं हूं। तब बोले कि आप तो पॉजिटिव हैं। मैंने कहा कि सर, मेरा तो आपने सैंपल ही नहीं लिया। जांच ही नहीं की तो फिर मेरी रिपोर्ट पॉजिटिव कैसे आ गई। ऐसे में स्टाफ बोला कि तुम तो आईसीयू में चलो। वहीं जांच हो जाएगी। यहां किसी चीज को हाथ मत लगाना। तुम्हारी रिपोर्ट पॉजिटिव है।’

शबनम कहती हैं, इस पर मेरे पति और मैंने विरोध करना शुरूकर दिया। थोड़ा तेज आवाज में बोले तो स्टाफ छोड़कर चला गया। तब शबनम के पति ने महिला स्टाफ से कहा कि अगर यही कोरोना पेशेंट है तो इसके पति का नाम बताओ। तब स्टाफ रिपोर्ट में लिखा शबनम के पति का नाम नहीं बता सका।

शबनम बोलीं, हम जब भी विरोध करतेथे, स्टाफ हड़बड़ा जाता था कि कहीं आगे हमारी शिकायत न कर दे। शबनम कहतीं हैं, जरूरत पड़ने पर घर से सामान मंगवाना पड़ता था और कोई सामान लेकर अस्पताल आता, तो उसे वार्ड तक पहुंचाने के लिए वहां ड्यूटी कर रहा वार्ड बॉय 50 रुपए मांगता था।



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अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद 9 जून को बच्ची के हाथ का ऑपरेशन के लिए माता पिता ने डॉक्टरों से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि 15 दिन का क्वारैंटाइन पीरियड पूरा होने पर ही इलाज करेंगे। यही वजह है कि  पिछले 10 दिनों से यह दंपती अपनी मासूम बच्ची का टूटा हाथ लेकर इलाज के लिए घूम रहे है।


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