हम जब भी कभी बस, ट्रेन, फ्लाइट में यात्रा करते हैं तो देखते हैं कि बहुत लोगों को जैसे ही थोड़ा खाली समय मिलता है, वे सो जाते हैं। मतलब की उनके अंदर नींद की कमी है। अब इस तरह से, दिन के 10 बजे या शाम के 5 बजे कौन सो सकता है। वही, जिसकी नींद पूरी न होती हो, जिसे स्लीप डिप्राइव्ड कहते हैं। आज हममें से अधिकतर स्लीप डिप्राइव्ड बन चुके हैं।

एक तो हमारा सोने का समय सही नहीं है और दूसरा कि हमारी नींद अच्छी नहीं है। क्योंकि हम रात के 12-1 तो ऐसे ही बजा देते हैं। फिर काम करते-करते लैपटॉप बंद करके सो जाते हैं तो हम सोचते हैं कि हमारा मन भी बंद हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं होता है। हमने मन को काम दे दिया है, वो कैसे सो सकता है।

जब हम 5-6 घंटा सोकर उठते हैं तो शरीर को तो आराम मिल जाता है, लेेकिन हमारा मन थका हुआ होता है। इसलिए हम सुबह-सुबह तरोताजा अनुभव नहीं करते। सुबह-सुबह लोगों के चेहरे देखो, ट्रैफिक जाम में लोगों के चेहरे देखो। लोग थके हुए दिखते हैं, चेहरे से ताजगी दिखती ही नहीं है।

थके हुए गाड़ी चला रहे हैं, जीवन चल रहा है, यह समय तो जीवन को रीसेट करने वाला है। यह समय सबसे बेहतर समय है। हमें याद ही नहीं है कि हम कब अपने साथ बैठे थे। इस समय बहुत लोगों को अपने साथ बैठना मुश्किल हो रहा है। क्योंकि हम साधनों के ऊपर निर्भर हो चुके थे।

अगर हम सिर्फ अपने बीस-तीस साल पहले के जीवन को देखें। जब हम स्कूल या कॉलेज में थे। जब हमारी छुट्टी के दिन होते थे तो हमारे पास कुछ नहीं होता था करने के लिए। तो हम बहुत देर ऐसे ही बैठे रहते थे। मम्मी-पापा बोलते थे, कोई बात नहीं, दो महीने छुट्टी है, बोर हो सकते हैं। तब भी हम कुछ न कुछ करते रहते थे।

लेकिन अभी हम छुटि्टयों में भी बच्चों को फ्री नहीं छोड़ते। फिर हमारे पास फोन तो है ही। ट्रैफिक सिग्नल पर भी लोगों को 40-50 सेकंड मिलता है उतनी देर में भी फोन उठाकर मैसेज चेक करते हैं। मतलब हम 50 सेकंड भी खाली नहीं बैठ सकते हैं। मतलब मन पूरी तरह से दूसरी चीजों पर निर्भर हो गया है। अगर आप खुद के साथ बैठ जाएं, तो ये हमें तंग करने लग जाता है। क्योंकि इसके अंदर बहुत सारे विचार हैं, जो हमने दबाकर रखे हुए हैं।

ये सब बाहर आने शुरू हो जाते हैं। यह समय खुद के साथ बैठने के लिए है। शुरू-शुरू में थोड़ा मुश्किल लगेगा। हाथ-पैर यहां वहां हिलने लगेंगे, कुछ ढूंढने लगेंगे। शरीर का हिलना-डुलना तीन-चार दिन में खत्म हो जाएगा और आप आराम से बैठना सीख जाएंगे। यह समय हमें इसलिए भी मिला है कि हम अपने मन की सफाई कर लें।

क्योंकि ये परिस्थिति हमें सिखा गई है कि हमारा मन बहुत मजबूत नहीं है। एक बात आई और हम सब इतना घबरा गए। अपने आपको शक्तिशाली बनाने के लिए मन को साफ करने की जरूरत है। इसके अंदर बहुत कुछ जमा कर रखा है। घर को साफ करने का समय मिल रहा है, तो मन को भी साफ करने का समय मिल रहा है।

हमने बहुत समय से बहुतों को धन्यवाद ही नहीं किया होगा। इस समय प्रकृति का शुक्रिया कीजिए, शरीर का शुक्रिया कीजिए कि इतना कुछ हो रहा है, पर तुम तो बिल्कुल स्वस्थ हो। मतलब अपने मन की फ्रिक्वेंसी को ऊपर ही रखना है। हम बहुत सारी आदतें बदलने की सोच रहे थे, जैसे काम करने का तरीका, सफाई रखने का तरीका, बागवानी आदि। ये जो समय मिला है उसे ऐसे ही नहीं गंवाना। ये भी हमें कुछ करने के लिए, कुछ बदलने के लिए मिला है, तो कुछ सीखने के लिए भी।

घर बैठे हुए आपको पहले से ज्यादा तनाव हो सकता है। क्योंकि जितना हमारा मन इस तरह से डिस्टर्ब होगा, फिर रिश्तों में टकराव ज्यादा होगा। अगर आप रोज सुबह मेडिटेशन कर अपने मन को सकारात्मक संकल्पों से भरेंगे तो रिश्तों में पहले जो टकराव था, ठीक हो जाएगा।

अभी एक-दूसरे को समझने का बहुत अच्छा समय मिला है। वैश्विक महामारी के कारण हमें जो समय मिला है, उसको अलग नजरिए से देखिए कि मेरे भाग्य ने मुझे सुनहरा समय दिया है, जिसमें मैं अपना पूरा जीवन बदल सकता हूं। उस वायरस को भी थैंक्यू बोल दीजिए कि आपने मुझे वे बहुत सारे पाठ सिखाए, जो मुझे सीखने थे। अब आप जा सकते हैं... बाय... बाय...।



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बी के शिवानी, ब्रह्मकुमारी ।


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