भगवान द्वारकाधीश के मंदिर की तरह 12 ज्योतिर्लिंग में से एक द्वारका के नागेश्वर महादेव मंदिर में भी सन्नाटा पसरा है। यहां भी हर साल सप्तमी से जन्माष्टमी के बीच लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन इस साल कोरोना के चलते यहां सिर्फ 8 से 10 स्थानीय श्रद्धालु ही आ रहे हैं।

द्वारका से करीब 30 किमी दूर बेट द्वारका की तरफ जाते हुए बीच में यह मंदिर पड़ता है। इसके चलते द्वारकाधीश आने वाले श्रद्धालु यहां जरूर आते हैं। इसके अलावा ये मंदिर उन श्रद्धालुओं के लिए खास है, जिनकी कुंडली में कालसर्प या नाग दोष होता है। मान्यता है कि यहां अलग-अलग धातुओं के बने नाग-नागिन अर्पित कर उनकी पूजा करने से नाग दोष दूर हो जाता है।

भगवान शिव और माता पार्वती नाग रूप में प्रकट हुए थे
नागेश्वर महादेव मंदिर के महंत गिरिधर भारती गोस्वामी बताते हैं कि पूरे सावन महीने में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। क्योंकि, सर्पदोष से मुक्ति के लिए सावन महीने में ही यहां पूजा का विशेष महत्व है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां भगवान शिव और माता पार्वती नाग रूप में प्रकट हुए थे। इसके बाद ही इस मंदिर का निर्माण हुआ।

जन्माष्टमी पर यहां आने से श्रद्धालुओं को एक बार में ही भगवान श्रीकृष्ण और भगवान द्वारकाधीश के दर्शन हो जाते हैं। इसी के चलते सप्तमी से जन्माष्टमी तक यहां लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। लेकिन, इस बार दिन भर में सिर्फ 8-10 श्रद्धालु ही आ रहे हैं और ‌वे भी स्थानीय।

रुद्र संहिता में शिव को 'दारुकावन नागेशम' के रूप में बताया गया है।

नागेश्वर मंदिर की महिमा
नागेश्वर मंदिर द्वारकानगरी की सीमा में स्थित प्राचीन शिव मंदिर है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। नागेश्वर का अर्थ है भगवान शिव द्वारा दोषों से मुक्ति। रुद्र संहिता में शिव को 'दारुकावन नागेशम' के रूप में बताया गया है। नागेश्वर को पृथ्वी पर प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है।

नागेश्वर के अलावा इस ज्योतिर्लिंग के अन्य देव स्थान जगतेश्वर (अल्मोड़ा, उत्तराखंड) और औंध (महाराष्ट्र) में हैं। शिव पुराण के अनुसार नागेश्वर दारुकवन (एक पौराणिक वन का नाम) है। अन्य प्राचीन ग्रंथों जैसे कि काम्यकवन, द्वैतवन और दंडकवन आदि में भी दारुकवन का उल्लेख मिलता है।

नागेश्वर महादेव के नाम के पीछे की दंतकथा
दारुका नाम की एक राक्षस कन्या ने कठिन तपस्या कर माता पार्वती को प्रसन्न कर लिया था। उसने माता से कहा कि दारुका वन में हम नहीं जा सकते, लेकिन वहां कई प्रकार की दैवीय औषधियां हैं। सद्कर्मों के लिए हम राक्षसों को उस वन में जाने का वरदान दीजिए।

माता ने सत्कर्म के उद्देश्य से राक्षसों को वन में जाने का वरदान दे दिया, लेकिन वरदान मिलते ही दारुका और अन्य राक्षसों ने वन को देवताओं से छीन लिया और वहां रहने वाली सुप्रिया नाम की एक शिवभक्त को बंदी बना लिया था। इसके बाद सुप्रिया ने शिव की तपस्या की और उनसे राक्षसों के नाश का वरदान मांगा।

जब शिव ने दारुका का वध किया तो दारुका ने उनसे इस वन का नाम नागेश्वर रखने की इच्छा व्यक्त की, जिसके बाद इस वन का नाम नागेश्वर हो गया।



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यह नागेश्वर मंदिर है, जो 12 ज्योतिर्लिंग में शामिल है। यह द्वारका के पास ही है।


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