इस साल हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर हिंदी भाषियों, हिंदी प्रेमियों और शुभचिंतकों को पांच संकल्प लेने चाहिए ताकि हमें राजभाषा पखवाड़े के पाखंड से मुक्ति मिले। साथ ही हिंदी दिवस के नाम पर हर साल हिंदी की बरसी न मनानी पड़े। कड़वा सच यह है कि अंग्रेजों के जाने के बाद से देश में अंग्रेजी की गुलामी घटी नहीं, बढ़ी है। एक दिन हिंदी दिवस है, बाकी 364 दिन अघोषित अंग्रेजी दिवस।

सच यह है कि ‘राजभाषा’ नामक कागज का गहना पहनी सरकारी हिंदी की हैसियत स्वामिनी की नहीं, सेविका जैसी है। जैसे मालकिन से झाड़ खाने के बाद दासी घर में बच्चों पर हाथ चलाती है, मालकिन से मिली साड़ी पहन पड़ोसन पर ऐंठ दिखाती है। वैसे ही हिंदी बाकी भारतीय भाषाओं पर झूठा रौब जमाती है। अपनी ही दर्जनों बोलियों का गला दबाती है।

संख्या के हिसाब से दुनिया की चौथी बड़ी भाषा बोलने वाले इससे पिंड छुड़ाने आतुर हैं। सरकारी नीति का सच यह है कि नई शिक्षा नीति के बहाने मातृभाषा में शिक्षा पर भले सार्थक बहस हुई हो, लेकिन जब एक तमिल राजनेता ने हिंदी वर्चस्व का खतरा बताया तो सरकार ने तुरंत सफाई दी कि हिंदी लादने की कोई मंशा नहीं है। यानी अंग्रेजी के वर्चस्व को कोई खतरा नहीं है। सच यह है कि न पिछली सरकारों में हिम्मत थी और न ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दुहाई देने वाली इस सरकार में यह हिम्मत है कि वह सत्ता और बाजार में अंग्रेजी के वर्चस्व को हाथ भी लगा सके।

सच यह है कि अंग्रेजी के वर्चस्व के खिलाफ लड़ाई अकेली हिंदी लड़ नहीं सकती। जब तक सभी भारतीय भाषाएं एक-दूसरे का हाथ नहीं पकड़तीं, यह लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। हिंदी को विशेष अधिकार नहीं बल्कि विशेष जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि वह सभी भारतीय भाषाओं को जोड़े।

यह तभी संभव होगा अगर हिंदी छोटी मालकिन बनने का लालच छोड़, बाकी भारतीय भाषाओं की सास और खुद अपनी बोलियों की सौतेली मां बनने की बजाय उनकी सहेली बने। हिंदी देश की सभी भाषाओं के बीच पुल का काम कर सकती है, लेकिन तभी अगर वह खुद इसकी मांग न करे, बस बाकियों को अपने ऊपर से आने-जाने का मौका दे, अगर वह अपने भीतर हिंद देश की विविधता को आत्मसात कर पाए।

पहला संकल्प: हम हिंदी की पूजा-अर्चना करने की बजाय उसका इस्तेमाल करेंगे। सिर्फ घर और रसोई में ही नहीं, सामाजिक प्रतिष्ठा के मंचों पर हिंदी बोलेंगे, सोशल मीडिया पर हिंदी भी लिखेंगे। बचपन के संस्मरण को याद करने के लिए ही नहीं, देश-दुनिया के भविष्य की बात भी हिंदी में करेंगे। सिर्फ बुजुर्गों से नहीं, बच्चों से भी हिंदी में बात करेंगे, उन्हें हिंदी सिखाएंगे।

दूसरा संकल्प: हम हिंदी के शिल्पियों को मान देंगे, हिंदी के बाजार को पैसा देंगे। सिर्फ हिंदी के सीरियल देखने या क्रिकेट या राजनीति की कमेंट्री हिंदी में सुनने से भाषा नहीं बचेगी। भाषा तभी बचती है जब शब्द बचते हैं, गढ़े जाते हैं, साहित्य रचा जाता है, ज्ञान का निर्माण होता है। इसलिए ड्राइंग रूम में हिंदी का अखबार रखेंगे, बच्चों को बर्थडे गिफ्ट में हिंदी की किताबें भेंट करेंगे, असमिया और मलयालियों से सीखेंगे कि साहित्यकारों का सम्मान कैसे किया जाता है। हिंदी में बाल और किशोर साहित्य तथा विज्ञान रचना के लिए अनेक अवॉर्ड देंगे।

तीसरा संकल्प: हम शुद्ध हिंदी का आग्रह त्याग देंगे, हिंदी को अलग-अलग स्वर और व्याकरण में सुनने-पढ़ने की आदत डालेंगे। हिंदी तभी बड़ी बन सकती है जब वह बड़ा दिल रखे: आकाशवाणी की सरकारी हिंदी के साथ मुंबइया हिंदी, उर्दू से घुली-मिली हिंदी भी चलेगी, तो दर्जनों बोलियों में रंगी हिंदी भी। कबीर और रैदास की पुरानी हिंदी को समझेंगे तो साथ में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र को अपनी नई हिंदी का आविष्कार करना होगा।

चौथा संकल्प: हर हिंदी भाषी एक गैर हिंदी भारतीय भाषा सीखेगा। रवींद्रनाथ ठाकुर, सुब्रह्मण्यम भारती, अमृता प्रीतम, कुवेंपु या नामदेव धसाल को मूल में पढ़ने से हिंदी भी समृद्ध होगी। तीसरी भाषा के नाम पर रट्टामार संस्कृत की खानापूर्ति की बजाय अगर उत्तर प्रदेश में तमिल, बिहार में बांग्ला, हरियाणा में तेलुगू, राजस्थान में कन्नड़, मध्यप्रदेश में मराठी और छत्तीसगढ़ में ओड़िआ सिखाई जाए तो हिंदी द्वेष अपने आप खत्म हो जाएगा।

पांचवां संकल्प: ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द का इस्तेमाल हम हिंदीभाषी भूलकर भी नहीं करेंगे। संविधान या कोई भी कानून देश में किसी भी एक ‘राष्ट्रभाषा’ का जिक्र नहीं करता। बेहतर हो कि हिंदी ‘राजभाषा’ का कागजी आभूषण वापस कर दे। हिंदी के प्रचार-प्रसार का काम सरकार न करे।

अगर महात्मा गांधी या चक्रवर्ती राजगोपालाचारी सरीखा कोई गैर-हिंदी भाषी हिंदी के गुणगान करना चाहे तो उसकी मर्जी, हिंदी भाषी खुद यह काम छोड़ दें। 14 सितंबर को हिंदी दिवस की जगह भारतीय भाषाओं का ‘भाषा दिवस’ मनाया जाए। अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ने का राष्ट्रीय आंदोलन तभी सफल होगा जिस दिन भारत में भारत की भाषाओं को किसी एक दिवस की जरूरत ही न रहे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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योगेन्द्र यादव, सेफोलॉजिस्ट और अध्यक्ष, स्वराज इंडिया


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