कोरोना के चलते देशभर में स्कूल-कॉलेज बंद हैं। इस दौरान बच्चों की पढ़ाई बिगड़े न, इसलिए देशभर में ऑनलाइन क्लासेस शुरू हो गईं। गांव से लेकर शहर तक, हर कहीं। जब ऑनलाइन क्लासेस लेने की बात आई तो सबसे बड़ी मुश्किल उन टीचर्स के सामने थी, जिनका ऑनलाइन दुनिया से कम वास्ता था। इनमें वो टीचर भी थे जिनके लिए मोबाइल सिर्फ नंबर डायल करने और फोन रिसीव करने भर का साधन है। हमने एक सरकारी स्कूल टीचर से जानी ऑनलाइन टीचर बनने की उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी...

पहली बार जब लॉकडाउन लगा तो मैं बहुत परेशान नहीं हुई। उम्मीद थी कि जल्द ही सबकुछ नॉर्मल हो जाएगा। मैं स्कूल जाऊंगी और बच्चों को पहले जैसे पढ़ा पाऊंगी। लेकिन जब एक के बाद एक लॉकडाउन बढ़ने लगा तो एक टीचर के नाते बच्चों की पढ़ाई की चिंता होने लगी। आखिर बच्चे कब तक घर पर बैठेंगे? कुछ बच्चों के फोन भी आते थे कि मैम स्कूल कब खुलेंगे? हमारी पढ़ाई कैसे होगी? तब मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था।

बात 14 अप्रैल की है। हम टीचर्स का जो वॉट्सऐप ग्रुप था, उसमें प्रिंसिपल सर का मैसेज आया कि बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाना है, उसकी तैयारी करिए। ऑनलाइन क्लास लेने की बात मेरे लिए बिल्कुल नई थी। मैं फेसबुक और वॉट्सऐप कभी-कभी जरूर चलाती थी, लेकिन ऑनलाइन क्लास की कोई समझ ही नहीं थी। सच कहूं तो तब मैंने पहली बार ग्रुप बनाना सीखा, इसके पहले मुझे नहीं पता था कि वॉट्सऐप ग्रुप बनाते कैसे हैं और लोगों को उसमें जोड़ा कैसे जाता है?

अंशु के स्कूल में क्लास एक से आठ तक के कुल 100 बच्चे वॉट्सऐप ग्रुप में हैं। हर क्लास के लिए अलग-अलग ग्रुप है।

हमारे सामने पहली चुनौती थी बच्चों के फोन नंबर पता करना और उन्हें इस बारे में बताना। पहले से कुछ बच्चों के नंबर थे तो उनको वॉट्सऐप ग्रुप में जोड़ लिया। उन बच्चों से कहा कि वे दूसरे बच्चों को भी इसके बारे में बताएं और उनके नंबर पता करें। फिर फेसबुक पर भी कुछ ग्रुप बनाए जिसमें हमने ऑनलाइन क्लास की जानकारी दी, ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को जोड़ा जा सके। इस तरह धीरे-धीरे बच्चे जुड़ते गए।

कई बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं था, कुछ बच्चों के मां-बाप उन्हें फोन ही नहीं देते थे, तो कुछ के पास रिचार्ज की दिक्कत थी। हमने इन बच्चों के मां बाप से बात की और उनकी सहूलियत के हिसाब से क्लास का टाइम रखा। कुछ बच्चों के फोन अपने पैसों से रिचार्ज करवाए और कुछ को फोन भी लाकर दिए। जिन बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं था, उन्हें हम कॉल करके पढ़ाते हैं। अभी हमारे स्कूल के क्लास एक से आठ तक के कुल 100 बच्चे वॉट्सऐप ग्रुप में हैं। हर क्लास के लिए अलग-अलग ग्रुप है।

शुरुआत में हम लोग दीक्षा ऐप से पढ़ाते थे, फिर जूम से पढ़ाने लगे। हालांकि, बच्चों के लिए ज्यादा आसान वॉट्सऐप है। वो कभी भी अपने सवाल यहां भेज देते हैं। हमें भी जवाब देने में सहूलियत होती है। जो बच्चे मैसेज टाइप नहीं कर पाते हैं वो अपनी आवाज रिकॉर्ड कर भेज देते हैं, हम लोग भी उसी तरीके से उनको जवाब दे देते हैं। ऑनलाइन क्लास ने मेरी लाइफ बदलकर रख दी है। अब मैं हमेशा मोबाइल अपने साथ रखती हूं। रात में सोने से पहले और सुबह उठते ही सबसे पहले फोन देखती हूं कि बच्चों के कुछ मैसेज तो नहीं आए, उन्हें कुछ पूछना तो नहीं है। मैं नहीं चाहती कि बच्चों को जवाब देने में जरा भी देर हो, क्योंकि कई बच्चों के पास बहुत कम समय के लिए ही मोबाइल होता है।

तस्वीर कृष्ण जन्माष्टमी की है जब बच्चे राध-कृष्ण बने थे। उन्होंने घर से ही अपने फोटो ग्रुप में भेजे।

अगर उन्हें जल्दी जवाब नहीं दिया तो उनके मां-बाप उनसे मोबाइल ले लेंगे। इसलिए हमने बच्चों की क्लास सुबह 6 बजे से लेना शुरू कर दिया है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि एक हाथ से खाना पकाती हूं और दूसरे से बच्चों के सवालों के जवाब देती हूं। कई बार ज्यादा देर तक मोबाइल चलाने से चिढ़ होने लगती है पर बच्चों के मासूम सवालों को देखकर अगले ही पल हंसी आ जाती है।

ऑनलाइन क्लास से कई बार बच्चे भी बोर हो जाते थे। फिर हमने सोचा कि क्यों न कुछ नया किया जाए, जिससे बच्चों का मन भी लगे और उनकी पढ़ाई भी जारी रहे।

अब हमने डांस, म्यूजिक और ड्रॉइंग जैसी चीजें भी शुरू कर दीं हैं। बच्चे ड्रॉइंग बनाकर ग्रुप में भेजते हैं। कुछ बच्चे डांस और सिंगिंग के वीडियो और ऑडियो भेजते हैं। इससे हमें कई बच्चों के अंदर छुपे हुए टैलेंट के बारे में भी पता चला है। हाल ही में हमने कृष्ण जन्माष्टमी और 15 अगस्त बच्चों के साथ ऑनलाइन सेलिब्रेट किया। अब हम बच्चों के साथ मिलकर शिक्षक दिवस भी सेलिब्रेट करेंगे। वो भी ऑनलाइन। इस नए सिस्टम में सबसे प्यारी बात ये रही कि बच्चे मुझे गुड मॉर्निंग, गुड नाइट के मैसेज भेजते हैं और इमोजी भी। वो हालचाल पूछते हैं कि मैडम जी आपकी तबियत ठीक है?

(अंशु बिहार के दीघा के सरकारी स्कूल उत्क्रमित मध्य विद्यालय बांसकोठी में टीचर हैं)



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