(समीर राजपूत) कोरोनावायरस से ठीक हो चुके 45% मरीजों पर उसके साइड इफेक्ट नजर आने लगे हैं। संक्रमणमुक्त होने के बाद मरीजों को हाइपरटेंशन, जोड़ों में दर्द, सांस फूलने, स्ट्रोक, डायबिटीज से जुड़ी परेशानियां बढ़ रही हैं। अपोलो के सीओओ डॉ. करन ठाकुर ने कहा कि देश में कोरोना से पहले गैर-संक्रामक रोगों से मरीजों की मृत्यु दर 70% से ज्यादा थी। लेकिन, अब ऐसी समस्याएं बढ़ने से लंबी अवधि में मृत्यु दर बढ़ सकती है।

अनियंत्रित हुई डायबिटीज, फेफड़े की क्षमता कम हुई

63 साल की महिला का ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, थॉयराइड जैसी को-मोर्बिड स्थिति की वजह से आईसीयू में इलाज चला। लेकिन डायबिटीज बेकाबू होने की वजह से दोबारा ओपीडी में इलाज चला। फेफड़े की कार्यक्षमता को मजबूत करने के लिए 15 दिनों तक लंग रिहेब थैरेपी दी गई।

थकावट डिप्रेशन, चिंता और पोस्ट ट्रोमेटिक स्ट्रेस

आईसीयू-वेंटिलेटर पर रह चुके 10 से ज्यादा मरीज स्वस्थ होने के बाद डिप्रेशन, पोस्ट ट्रोमेटिक स्ट्रेस सिन्ड्रोम का शिकार पाए गए। ऐसे मरीजों को न्यूरो फिजीशियन और साइकियाट्रिक इलाज की जरूरत पड़ती है। डिप्रेशन के मरीजों की औसत उम्र 40 साल थी।

दिमाग की नस में ब्लॉकेज, शिथिल हो गया आधा शरीर

एक 45 साल के मरीज को कोविड वार्ड से डिस्चार्ज करने के 6 दिन में ही यह समस्या पेश आई। उसके शरीर के दाएं हिस्से में कमजोरी आ गई थी। एमआरआई से पता चला कि स्ट्रोक की वजह से दिमाग की एक नस में ब्लॉकेज हो गया है। ये ब्लॉकेज न्यूरो फिजीशियन ने निकाला।

छुट्टी के 2 हफ्ते बाद ही फूलने लगी सांस

38 साल के व्यक्ति को कोरोना के सामान्य लक्षण थे। ऑक्सीजन की जरूरत पड़ी थी, लेकिन 14 दिन में स्वस्थ हो गए। घर जाने के दो हफ्ते बाद दोबारा सांस की समस्या के साथ लौटे। उनके फेफड़े में फायब्रोसिस हो गया था। ऑक्सीजन और फेफड़े की कसरत करवाने से स्वस्थ हुए।

अति आत्मविश्वास में न आएं, प्रोटोकॉल का पालन करें: एक्सपर्ट

डॉक्टर तेजस पटेल ने कहा लापरवाही न बरतें। ये नए तरह का रोग है। अति-आत्मविश्वास जानलेवा हो सकता है। मास्क पहनें, हाथ धोएं और दो गज दूरी के प्रोटोकॉल को बिल्कुल नजरअंदाज न करें।



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फाइल फोटो


from Dainik Bhaskar /national/news/lung-and-heart-disease-increases-in-45-of-people-recovering-from-epidemic-experts-worried-about-increasing-non-infectious-diseases-like-stroke-diabetes-127845074.html

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